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मंगलवार, 20 जनवरी 2009

लघु कथा: पागल कौन/कृष्ण कुमार यादव

शाम का समय था। लोगों का झुण्ड तेजी से अपने-अपने गंतव्य की तरफ लौट रहा था। वहीं सड़क किनारे एक अधनंगी युवती बैठी हुई थी। कभी वह बुदबुदाती तो कभी छाती को अपने दोनों हाथों से पीटती। उसके आसपास से जितने लोग गुजरते, उतनी बातें करते। कोई कहता- बेचारी सताई हुई है। कोई उसे पागल बताता। तभी उसके बगल से मनचलों का एक झुण्ड निकला और आगे जाकर इशारों ही इशारों में उसको लेकर बातें करने लगा। 

अगली सुबह सड़क के किनारे उस युवती की खून से लथपथ नंगी देह पड़ी हुई थी। लोग गुजरते हुए कहते जाते हैं- ”च्...च्...च्.. बेचारी पगली!” 

कोई नहीं सोचता कि कौन है वास्तव में पागल- हवस की शिकार वह बेबस युवती या वे वहशी, जिन्होंने उस अभागी का बलात्कार करके समूची मानवता को शर्मसार कर दिया था ?

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