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शनिवार, 30 अगस्त 2008

बचपन

मैं डरता हूँ
अपना बचपना खोने से
सहेज कर रखा है उसे
दिल की गहराइयों में
जब भी कभी व्यवस्था
भर देती है आक्रोश मुझमें
जब भी कभी सच्चाई
कड़वी लगती है मुझे
जब भी कभी नहीं उबर पता
अपने अंतर्द्वंदों से
जब भी कभी घेर लेती है उदासी
तो फिर लौट आता हूँ
अपने बचपन की तरफ
और पाता हूँ एक मासूम
और निश्छल सा चेहरा
सारे दुःख -दर्दों से परे
अपनी ही धुन में सपने बुनता।
***कृष्ण कुमार यादव***
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